हिंदुओं के प्रति नफरत का मूल कारण - श्याम कुमार 


     कई दशक पूर्व इलाहाबाद(अब प्रयागराज) में प्रो. नसीर इलाहाबाद विष्वविद्यालय के उर्दू विभाग की   अध्यक्ष थीं और विद्वान होने के साथ मिलनसार स्वभाव की थीं। वह रीता बहुगुणा जोषी की मां कमला बहुगुणा की घनिश्ठ मित्र थीं। मैं उस समय प्रयागराज मेंवरिष्ठ पत्रकार था तथा हेमवतीनंदन बहुगुणा व कमला बहुगुणा के साथ प्रो. नसीर से भी मेरी मित्रता थी। ईद पर प्रो. नसीर के नया कटरा में स्थित आवास पर बड़ी रौनक हुआ करती थी और जायकेदार सिवइयों आदि के साथ गरमागरम स्वादिश्ट समोसों का अभी भी मुझे स्मरण है। प्रो. नसीर राष्ट्रवादी विचारों की थीं तथा उनकी एक पुत्री नासिरा हिंदी की बड़ी साहित्यकार है। एक बार प्रो. नसीर ने हिंदू-मुसलिम विषय पर चर्चा के दौरान कहा था कि वह युवा मुसलिमों में हिंदुओं के प्रति जो विचार सुनती हैं, उससे उन्हें आष्चर्य होता है कि मुसलिम युवाओं में हिंदुओं के प्रति कितनी अधिक नफरत है और यह नफरत देष के लिए अच्छी नहीं है। तय बात है कि उस समय की वह मुसलिम युवा पीढ़ी अब बाबा-नाना बन चुकी होगी तथा हिंदुओं के प्रति उसकी घृणा उसकी तीसरी पीढ़ी में फलीभूत हो रही होगी।  
      उस समय पुरानी एवं युवा मुसलिम पीढ़ी में हिंदुओं के प्रति ही नहीं, भारत के प्रति भी घोर घृणा की भावना थी तथा पाकिस्तान के प्रति उन दो पीढि़यों का जबरदस्त झुकाव था। मुसलमानों की पुरानी पीढ़ी वही   पीढ़ी थी, जिसने मजहब के आधार पर मुसलिम देष पाकिस्तान के निर्माण की जिन्ना की मांग का पूरे देष में भरपूर समर्थन किया था, किन्तु विभाजन के समय फर्जी सेकुलरवाद के जनक जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर पाकिस्तान जाने के बजाय भारत में रह गई थी। जवाहरलाल नेहरू स्वयं पक्के हिंदू-विरोधी थे और महात्मा     गांधी ने सरदार पटेल के बजाय नेहरू को देष की बागडोर सौंपने की गलती की थी। उस समय मुसलमानों ने जिन्ना की मांग का समर्थन करने के बावजूद भारत में रुक जाने की यह रणनीति बनाई थी कि कुछ वर्शाें बाद यहां अपनी जनसंख्या बढ़ाकर नेहरू वंष के सहयोग से वे भारत का इसलामीकरण कर देंगे। उस समय ये नारे लगते थे- ‘हंस के लिया है पाकिस्तान, लड़कर लेंगे हिंदुस्तान’ आदि। पाकिस्तान नया-नया बना था तथा अमरीका, इंग्लैंड व अन्य विभिन्न इसलामी देष पाकिस्तान के रक्षक एवं पोशक बने हुए थे। इसीलिए भारत के अधिकांष मुसलमानों की निश्ठा तब मजबूत पाकिस्तान के प्रति थी।   
        मुसलमानों की नई पीढ़ी भी उस समय अपने घर के घोर साम्प्रदायिक माहौल में पलकर पाकिस्तान के प्रति निश्ठावान थी। लोगों को याद होगा कि भारत-पाकिस्तान के बीच होनेवाले क्रिकेट मैचों में पाकिस्तान की जीत पर सभी जगह मुसलिम मुहल्लों में जमकर खुषी मनाई जाती थी और पटाखे छोड़े जाते थे। नेहरू के फर्जी सेकुलरवाद ने हिंदुओं में भी ऐसी बड़ी संख्या खड़ी कर दी थी, जो लोग हिंदू नामधारी तो थे, किन्तु हिंदू धर्म एवं प्राचीन भारतीय संस्कृति के कट्टर विरोधी थे। उनमें कम्युनिस्ट विषेश रूप से षामिल थे, जिनका समस्त इतिहास हिंदू धर्म एवं भारत का विरोध ही रहा है। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी आदि नेहरूवंषियों ने अपना वोटबैंक मजबूत करने के लिए मुसलिम-तुश्टीकरण की अपनी खानदानी परम्परा के साथ तरह-तरह के प्रलोभनों से हिंदूनामधारी फर्जी सेकुलरियों के जयचंदी गिरोह पूरे देष में पैदा कर दिए। वे गिरोह आज भी हिंदू धर्म एवं प्राचीन भारतीय संस्कृति को नश्ट करने में लगे हैं, जिसका परिणाम देष को क्षति पहुंचाने के रूप में सामने आ रहा है। नरेंद्र मोदी को जब चुनाव में प्रचंड बहुमत प्राप्त हुआ था, उसी समय उन्हें इतिहास से सबक लेकर विनाषकारी तत्वों का सफाया करने के लिए तुरंत कदम उठाने चाहिए थे। किन्तु उन्होंने उदारता के चक्कर में वैसा नहीं किया, जिसका दुश्परिणाम सामने आ रहा है तथा अभी और भयंकर परिणाम भविश्य में आने की संभावना है। 
      हिंदुओं के प्रति मुसलमानों में जो घृणा-भाव है, उसके प्रमाण के लिए कहीं दूर जाने की आवष्यकता नहीं है। फेसबुक एवं टीवी-चैनलों पर मोदी के प्रति उस नफरत की झलक नित्यप्रति देखी जा सकती है। मौलानाओं की तो बहुत बड़ी खेप इस घृणा के प्रचार-प्रसार में लगी हुई है तथा सभाओं में उनके समर्थन में वहां मौजूद लोग जहरीली नारेबाजी करते हैं। यह इस बात का संकेत है कि देषद्रोह की भावना बड़ी तेजी से फैल रही है। अनपढ़ ही नहीं, पढ़े-लिखे मुसलिम भी उस रोग के षिकार हैं। दिल्ली के षाहीनबाग में तीन महीने से अधिक समय से जो हो रहा है, वैसे कुकृत्य देष के अन्य भागों में भी ‘षाहीनबाग’ पैदा करने के रूप में रचे गए। अलीगढ़ मुसलिम विष्वविद्यालय तो जिन्नावादियों की टकसाल था और आज भी वहां जिन्ना की तसवीर लगी हुई है। जामिया मिलिया ने भी सिद्ध कर दिया है कि वह उसी राह पर चलने लगा है। जवाहरलाल नेहरू विष्वविद्यालय तो अपने नाम के अनुरूप देषद्रोहियों की टकसाल बना हुआ है। ये अड्डे देष को कितनी भीशण क्षति पहुंचाने में लगे हुए हैं और देषद्रोही तत्व कितने मजबूत होते जा रहे हैं, यह दिल्ली में हाल में हुए सुनियोजित दंगे ने सिद्ध कर दिया है। दंगे का वह शड्यंत्र इतना सुनियोजित एवं सोचा-समझा था कि उसी के अनुसार बाद में दंगा षुरू करने का इलजाम उलटा हिंदुओं पर मढ़ दिया गया। 
      दिल्ली का दंगा भलीभांति रणनीति बनाकर एवं काफी पहले से तैयारी करके किया गया, लेकिन उपद्रवी गिरोह दंगे का कारण अमित मिश्र के सामान्य कथन को घोशित करने लगा। अमित मिश्र ने षाहीनबाग आदि में धरने के कारण आम जनता को मिल रही यातना के कारण सिर्फ इतना कहा था कि यदि सड़कों को घेरकर जनता का उत्पीड़न तीन दिनों में नहीं समाप्त किया गया तो वह सड़क पर उतरेंगे। जो लोग लम्बे समय से सड़कों को घेरकर अभी भी जनता को भीशण कश्ट में डाले हुए हैं, उनके अपराध को जानबूझकर नजरअंदाज कर अमित मिश्र के बयान को दंगे का कारण बताया जाने लगा। उनकी बातों से यह ध्वनित हुआ कि अमित मिश्र ने जैसे ही वह बयान दिया, तत्काल प्रतिक्रिया में दंगा फैल गया। जबकि हकीकत यह है कि दंगाइयों के घर पर दंगे के जो बड़े-बड़े साधन तैयार किए गए और पत्थरों की भारी जखीरेबाजी की गई, वह दीर्घकाल की तैयारी से ही संभव थी। बिलकुल वैसा ही किया गया, जैसे गोधरा में ट्रेन में आग लगाकर सैकड़ों कारसेवकों को जिंदा भून डाला गया था, किन्तु उस कुकृत्य की कभी चर्चा नहीं की जाती है। इसके विपरीत गोधरा की घटना की प्रतिक्रिया में जो गुजरात-दंगा हुआ, हमेषा सिर्फ उसका उल्लेख किया जाता है तथा उसे खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेष किया जाता है। गुजरात दंगे में मुसलमानों के साथ बड़ी संख्या में हिंदू भी मारे गए, जिनमें ज्यादातर पुलिस की गोली से भी मरे, किन्तु इस तथ्य का कोई उल्लेख नहीं किया जाता है। 
        इधर उपद्रवी प्रवृत्ति वाले मुसलिमों ने ‘मुंह में राम बगल में छुरी’ वाली नई रणनीति अपना ली है। वे पाकिस्तान की दुर्दषा देख रहे हैं और उसमें उन्हें अब कोई भविश्य नहीं परिलक्षित होता है। इसीलिए उनका पाकिस्तान के प्रति मोह समाप्त हो गया है, यहां तक कि वे पाकिस्तान के विरोध में भी बोलने लगे हैं। नई रणनीति के अनुसार वे संविधान, तिरंगा, राश्ट्रगान के प्रति प्रेम दिखाने लगे हैं। अब ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे कभी-कभी सुनाई देते हैं तथा पाकिस्तानी झंडा भी यदाकदा फहराया जाता है। वे लोग अब संविधान की रक्षा के नारे लगाते हैं। उनके इस ढोंग की आड़ में उनकी असलियत एवं वास्तविक मकसद को समझने की आवष्यकता है। वे देषद्रोही तत्व अपने रवैए से वस्तुतः उन मुसलमानों का बुरा कर रहे हैं, जो सचमुच देषभक्त हैं और हिंदुओं के साथ घुलमिलकर एक परिवार की तरह भाईचारे के साथ रहना चाहते हैं।