साधुओं का निर्मम हत्याकाण्ड


 -श्याम कुमार 
      पालघर(महाराश्ट्र) में साधुओं पर सुनियोजित हमला कर जिस प्रकार उनकी निर्ममतापूर्वक हत्या की गई, टीवी-चैनलों पर वह दृष्य देखकर लोग कांप उठे। पुलिस बल की मौजूदगी में उन दो निरीह    साधुओं एवं उनके वाहनचालक पर हिंसक भीड़ ने राक्षसों की तरह अत्याचार किया और उन्हें घेरकर इस बुरी तरह मारा कि उन तीनों के प्राण चले गए। एक वृद्ध साधु जान बचाने के लिए भागकर बगल में स्थित वन विभाग के कमरे में गया, जहां से पुलिसकर्मी उसे बाहर ले आया। वह वृद्ध रक्षा के लिए पुलिसकर्मी को जोर से पकड़े हुए था, किन्तु पुलिस वेषधारी नरपिषाच उस वृद्ध को गुंडों के हवाले कर अलग हट गया। उस वीभत्स हत्याकांड से पत्थर पिघल जाय, किन्तु हमारे देष में नेहरू के फर्जी सेकुलरवाद का अमृत पीकर देषभर में फैली हुई जो हिंदूविरोधी बिरादरी है, वह बेहयाई से हत्यारों का बचाव कर रही है। ‘मोमबत्ती गैंग’, ‘अवार्ड वापसी गैंग’ तथा अन्य फर्जी सेकुलरिए इस समय गायब हो गए हैं। इसीलिए लोग कह रहे हैं कि जिसके यहां गाय काटे जाने के सबूत मिले, उस पर नाराज लोगों ने जब हिंसक हमला किया तो पूरे देष में भीशण तूफान मचा दिया गया तथा विदेषों में भी भारत को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। लेकिन साधुओं की हुई अमानुशिक हत्या पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। कांग्रेस, सपा, बसपा, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस आदि राजनीतिक दलों के नेताओं के मुंह में जैसे दही जम गया है। हत्यारों का बचाव करने वाले कह रहे हैं कि जहां घटना हुई, वहां चोरियां होने की अफवाह थी, इसलिए चोरों के भ्रम में उक्त घटना हुई।  
 साधुओं के हत्याकांड के बारे में महाराश्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे बार-बार बयान दे रहे हैं कि वह हत्याकांड मुसलमानों ने नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि उक्त हत्याकांड की पूरी जांच होगी तथा कोई दोशी बख्षा नहीं जाएगा। आष्चर्य है कि उद्धव ठाकरे बार-बार मुसलमानों का हाथ न होने की सफाई क्यों दे रहे है? किसी ने यह दावा तो किया नहीं कि हत्याकांड में मुसलमानों का हाथ था। उक्त चर्चा तो इस बात से उठी थी कि उत्पाती भीड़ में किसी हमलावर द्वारा दूसरे हमलावर को ‘षुएब’ नाम से सम्बोधित करते सुना गया। यह भी बताया जा रहा है कि भीड़ में रोहिंग्याओं की बोली सुनी गई। चर्चा इस बात की भी है कि उस आदिवासी बहुलक्षेत्र में नक्सलवादियों का वर्चस्व है तथा ईसाई मिषनरियों द्वारा हिंदू धर्म के विरुद्ध दुश्प्रचार कर एवं लालच देकर तमाम आदिवासी परिवारों को ईसाई बना लिया गया है। तय बात है कि इन्हीं लोगों में से हमलावर वहां आए थे। बताया जाता है कि महाराश्ट्र सरकार में भागीदार षरद पवार की पार्टी का एक नेता भी भीड़ में दिखाई दे रहा है। वास्तविकता क्या है, यह निश्पक्ष जांच से ही पता लग सकता है। ऐसी स्थिति में उद्धव ठाकरे का मुसलमानों से सम्बंधित बयान जांच को प्रभावित कर गलत दिषा में ले जाने वाला है। राज्य सरकार की कोई जांच-एजेंसी मुख्यमंत्री के निश्कर्श के विरुद्ध कैसे जा सकती है? अतः निश्पक्ष जांच तभी संभव है, जब केंद्र सरकार की कोई जांच-एजेंसी हत्याकांड की जांच करे। किन्तु केंद्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) द्वारा  जांच किए जाने हेतु आवष्यक है कि राज्य सरकार उसके लिए केंद्र से कहे। निष्चित है कि जब यह आषंका है कि राज्य सरकार प्रकरण की लीपापोती कर रही है तो वह केंद्र से जांच के लिए कभी नहीं कहेगी।  
 यह आषा करना व्यर्थ है कि न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर आधी रात को अदालत लगाकर केंद्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) को साधुओं के हत्याकांड की जांच किए जाने का आदेष देंगे। ऐसी स्थिति में यह मांग की जा रही है कि केंद्र सरकार अपनी राश्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) से हत्याकांड की जांच कराए। षरद पवार ने साधुओं के हत्याकांड में पुलिस को निर्दाेश बताया है, जबकि हत्याकांड के वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि पुलिसबल ने हमलावरों पर नियंत्रण करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।   बल्कि रक्षा के लिए हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहे निरीह साधुओं को पुलिस ने हमलावरों के हवाले कर दिया। पालघर के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट विधायक विनोद, जो घटनास्थल पर दो दिन बाद पहुंचे, कह रहे हैं कि वहां चोरियां होने की अफवाह थी, इसलिए चोरों के भ्रम में उक्त घटना हुई। धन्य हैं मार्क्सवादी कम्युनिस्ट विधायक! वहां पर पूर्व में क्या चोरियां हुई थीं, इसका कोई प्रमाण नहीं दिया जा रहा है। यदि वहां पर चोरों को लेकर अफवाह थी तो उस अफवाह को दूर करने के लिए प्रषासन ने अपेक्षित कदम क्यों नहीं उठाए? क्या चोर भगवा वस्त्र पहनकर कार पर सवार होकर चोरी करने आते हैं? यह भी प्रष्न है कि जब दो दिन पहले वहां से गुजर रहे एक डॉक्टर पर हमला हो चुका था तो हिंसक तत्वों पर काबू करने के लिए षासन एवं प्रषासन ने वहां पर सुरक्षात्मक उपाय क्यों नहीं किए तथा अपराधी तत्वों की गिरफ्तारियां क्यों नहीं कीं? जब पहले वहां घटना हो चुकी थी तो उधर से गुजरने वालों की सुरक्षा के समुचित उपाय अवष्य किए जाने चाहिए थे। 


             



        बताया जाता है कि नक्सलवादी तत्वों एवं ईसाई मिषनरियों को विदेषों से जो भारी धन प्राप्त हुआ करता था, उस पर मोदी सरकार के कारण अंकुष लगा है तथा दषकों से देष में हिंदुओं का जो दमन किया जा रहा था, वह दमन मोदी के षासन में रुका है, इसीलिए वहां हिंदूविरोधी भावना खूब भड़काई जा रही है। ईसाई मिषनरियां वहां राम को दुश्ट एवं रावण को पूजनीय बताती हैं। इस प्रकार की तरह-तरह की अनुचित बातें प्रचारित कर वहां आदिवासियों को ईसाई बनाने का शड्यंत्र चल रहा है। जहां यह निर्मम हत्याकांड हुआ, वहां लॉकडाउन के बावजूद भारी संख्या में ईंट-पत्थर, कील लगे हुए डंडे तथा अन्य घातक सामग्रियां कैसे जमा हुईं, इस शड्यंत्र की गहराई से जांच की जानी चाहिए। लॉकडाउन के बावजूद सैकड़ों हमलावर वहां कैसे आ गए? साफ जाहिर है कि वह जानलेवा हमला पूरी तरह पूर्वनियोजित था। बताया जाता है कि अपने गुरु की अंत्येश्टि में जा रहे उन साधुओं के वाहन को मुख्य मार्ग से जाने से रोक दिया गया था तो उन्हें भीतर वाले रास्ते से जाना पड़ा। पुलिस की भूमिका स्पश्ट रूप से संदिग्ध एवं निंदनीय सिद्ध हो रही है, फिर भी राज्य सरकार ने मात्र दो पुलिसकर्मियों को निलम्बित किया है। इससे सिद्ध होता है कि सरकार द्वारा अपराधी पुलिसजनों एवं पुलिस अधिकारियों को बचाया जा रहा है। लोगों का मानना है कि राज्य सरकार द्वारा की जा रही कोई भी जांच हत्याकांड की वास्तविकता का रहस्योद्घाटन नहीं कर सकेगी, इसलिए केंद्र सरकार को स्वयं जांच करने के उपाय करने चाहिए। 


 


 


                                                         
                                                        (ष्याम कुमार)