सेनेटाइजर किंगमेकर बने संजय भूसरेड्डी

   


  संजय भूसरेड्डी ने यूपी में सेनेटाइजर के उत्पादन का एक अनोखा प्रयोग कर दिखाया, इससे प्रदेश में सेनेटाइजर की कमी भी पूरी हो गई और यूपी में बना सेनेटाइजर राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों को भेजा जा रहा है।


    लखनऊ के डालीबाग स्थित गन्ना संस्थान की सफेद रंग की बिल्डिंग के पांचवें तल पर प्रमुख सचिव, चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास और आयुक्त, गन्ना एवं चीनी के पद पर तैनात संजय भूसरेड्डी बैठ कार्य करते हैं। इस बिल्डिंग में प्रवेश करने से पहले एक ‘फैब्रिकेटेड’ वॉश बेसिन के सामने खड़ा होना अनिवार्य है। वॉश बेसिन के ऊपर हाथ लाते ही एक प्वाइंट से लिक्विड साबुन की बौछार होती है, 25 सेकेंड तक हाथ मलने के बाद नल से पानी निकलता है।हाथ सुखाने के बाद बगल में रखे सेनेटाइजर से भी हाथ को विसंक्रमित करके ही बिल्डिंग के भीतर प्रवेश दिया जाता है। पांचवें तल पर मौजूद संजय भूसरेड्डी के कक्ष की मेज पर सामने की ओर रखे एक लकड़ी के टुकड़े पर अंग्रेजी कहावत “द बक स्टॉप्स हियर” मोटे अक्षरों में लिखी है। आसान भाषा में इस कहावत का अर्थ है कि “जिम्मेदारी को किसी और पर नहीं डाला जा सकता, जिम्मेदारी स्वीकारनी होगी”। इसी कहावत को आत्मसात करके ही संजय भूसरेड्डी ने सेनेटाइजर की कमी झेल रहे प्रदेश में इसके उत्पादन का अनोखा और बड़ा प्रयोग कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।


     कोरोना का विश्वव्यापी संक्रमण बढ़ने पर भारत में भी एयरपोर्ट, मल्टी नेशनल कंपनियों के दफ्तरों, अस्पताल जैसी जगहों पर हैंड सेनेटाइजर का प्रयोग बढ़ गया था। प्रमुख सचिव, चिकित्सा शिक्षा रजनीश दुबे ने  मार्च में संजय को फोन पर यूपी के मेडिकल कालेजों, अस्पतालों में हैंड सेनेटाइजर की कमी हो जाने की जानकारी दी। दुबे ने संजय से इस बारे में कोई व्रहद उपाय करने की अपील की थी।


   हैंड सेनेटाइजर के निर्माण में ‘आइसो प्रॉपलीन एल्कोहल’ का उपयोग होता है जो कि काफी सस्ता होता है। आइसो प्रॉपलीन एल्कोहल का निर्माण गुजरात और महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर होता है। इन प्रदेशों में भी डिमांड काफी बढ़ जाने के कारण उत्तर भारत में सेनेटाइजर बनाने वाली कंपनियों को ‘आइसो प्रॉपलीन एल्कोहल’ की आपूर्ति काफी कम हो गई थी। प्रमुख सचिव आबकारी की भी जिम्मेदारी संभालने वाले संजय को पता चला कि यूपी में चीनी मिलों की डिस्टिलरियों के पास एथिल एल्कोहल पर्याप्त मात्रा में है जिसका उपयोग शराब के रूप में पीने के लिए किया जाता है।


   एथिल एल्कोहल में कुछ एंजाइम बदलकर इन्हें ‘आइसो प्रोपलिन एल्कोहल’ में तब्दील किया जा सकता है। हैंड सेनेटाइजर में 60 प्रतिशत एल्कोहल, ग्लिसरीन, डिस्टिल्ड वाटर और हाइपोक्लोराइड होता है। संजय ने फौरन आबकारी विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक की, प्रयागराज में आबकारी आयुक्त के मुख्यालय में एक नोडल अधिकारी तैनात किया गया।दवा या शराब बनाने को एथिल एल्कोहल पाने के लिए आबकारी विभाग से ‘फॉरेन लिकर (एफएल)-41’ लाइसेंस की जरूरत पड़ती है।एफएल-41 लाइसेंस पाने के लिए ड्रग लाइसेंस का होना बहुत जरूरी है, जबकि ‘आइसो प्रोपलीन एल्कोहल’ के निर्माण के लिए किसी प्रकार के लाइसेंस की जरूरत नहीं पड़ती है। युद्ध स्तर पर तैयारियां करके आबकारी विभाग ने 24 मार्च तक 40 कंपनियों को एफएल-41 लाइसेंस जारी किए। इनमें 11 चीनी मिलें (जिनके पास शराब बनाने वाली डिस्टलरी भी थी), सेनेटाइजर बनाने वाली कंपनियां, देशी और विदेशी शराब बनाने वाली कंपनियां और कुछ नई कंपनियां शामिल थीं।


    एफएल-41 लाइसेंस पाने के लिए कंपनियों को साल-साल भर आबकारी विभाग के चक्कर लगाने पड़ते थे, संजय ने इन्हें आवेदन करने के आधे दिन में पूरी पड़ताल करके लाइसेंस जारी कराए। केवल सेनेटाइजर बनाने वाली कंपनियो के पास ही ड्रग लाइसेंस थे। इनको छोड़कर अन्य सभी को ड्रग लाइसेंस जारी किए गए और अगले ही दिन एफएल-41 लाइसेंस भी थमा दिया गया। इन सभी कंपनियों को ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (डब्ल्यूएचओ) का प्रमाणित फार्मूलेशन दिया गया जिसके अनुरूप सेनेटाइजर का निर्माण किया जाना था।


 


  24 मार्च को प्रदेश की 11 चीनी मिलों समेत सभी 40 कंपनियों में सेनेटाइजर का निर्माण शुरू हो गया शुरुआत में साठ हजार लीटर सेनेटाइजर रोज बनाने का लक्ष्य रखा गया जो अब बढ़कर दो लाख लीटर रोज हो गया है। वर्तमान में 27 चीनी मिलें, 11 डिस्टिलरी, 36 सेनेटाइजर बनाने वाली कंपनियां और आठ अन्य कंपनियां सेनेटाइजर का उत्पादन कर रही हैं।अब तक यूपी में 35 लाख लीटर हैंड सेनेटाइजर का निर्माण हो चुका है। उत्तर प्रदेश  में बना सेनेटाइजर राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों को भेजा जा रहा है।केंद्र सरकार से तय मूल्य पर प्रदेश में सेनेटाइजर की बिक्री शुरू हुई है। 200 मिलीलीटर (एमएल) सेनेटाइजर का मूल्य 100 रुपए रखा गया है। सरकारी विभागों के लिए एक लीटर सेनेटाइजर की कीमत 110 रुपए रखी गई है। यूपी मेडिकल कार्पोरेशन अब तक एक लाख लीटर सेनेटाइजर खरीद चुकी है। इसके अलावा जिलाधिकारी के जरिए सभी जिलों के ग्रामीण अस्पतालों के लिए मुफ्त में भी सेनेटाइजर की सप्लाई भी की गई है।


      प्रदेश में जैसे ही कोरोना का प्रकोप बढ़ा संजय भूसरेड्डी ने 12 मार्च को एक आदेश जारी कर सभी चीनी मिलों के मुख्य गेट पर गन्ना लाने वाले किसानों के हाथ और पैर धुलने की व्यवस्था करने का आदेश जारी कर दिया। चीनी मिलें अपनी मशीनों को ‘सोडियम हाइपोक्लोराइड’ से सेनेटाइज करती हैं। संजय का आदेश मिलने के बाद गन्ना विभाग के सभी कार्यालयों को सेनेटाइज किया गया। इसके साथ चीनी मिलों ने गन्ना लाने वाले किसानों की गाड़ियों को भी सेनेटाइज करना शुरू किया।


    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से निर्देश मिलने के बाद संजय भूसरेड्डी ने चीनी मिलों से आसपास के इलाकों को भी सेनेटाइज करने का फरमान जारी कर दिया। अब तक ढाई हजार से अधिक गांव जो चीनी मिलों के क्षेत्र में आते हैं उन्हें सेनेटाइज किया जा चुका है। इसके अलावा दो सौ कस्बों, 16,00 संस्थाएं जिनमें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पीएचसी, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सीएचसी, थाना, चौकी, कलेक्ट्रेट शामिल हैं, को भी चीनी मिलें विसंक्रमित कर चुकी हैं।


    मूलत: आंध्र प्रदेश में हैदराबाद के रहने वाले संजय भूसरेड्डी के पिता नागपुर के मशहूर डेंटल सर्जन थे।इनके बाबा अंग्रेजों के समय 'सेंट्रल प्रॉविंस एंड बेरार स्टेट' की कैबिनेट के डेंटल सर्जन थे। संजय की प्रारंभिक शिक्षा नागपुर में हुई। वर्ष 1984 में नागपुर विश्वविद्यालय में जब कानून की पढ़ाई का पांच वर्षीय पाठ्यक्रम शुरू हुआ तो उस पहले बैच में संजय ने भी प्रवेश लिया। पढ़ाई के दौरान संजय ने कानून की जटिलताओं पर अपनी महारथ साबित कर दी थी।


    ‘टैक्सेशन लॉ’ में गोल्ड मेडल हासिल करने वाले संजय यूनिवर्सिटी की मेरिट में दूसरे स्थान पर थे। यही वजह थी कि कोर्स करने के बाद इनकी प्रैक्टिस चल निकली और इसके जरिए संजय को 50 हजार रुपए महीने की आमदनी होने लगी। इसी बीच वर्ष 1989 को संजय का चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा में हो गया।संजय को यूपी कैडर मिला और शुरुआत में ये मथुरा, झांसी और इटावा में ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात रहे।


    इसके बाद ये आगरा, फैजाबाद और आंबेडकरनगर में मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) और अल्मोड़ा, बलरामपुर, उन्नाव, बरेली के जिलाधिकारी रहे। मुख्यमंत्री कार्यालय में मुख्य विकास अधिकारी, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में निदेशक, सचिव आवास, प्रबंध निदेश, यूपी स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन (यूपीएसआरटीसी) में रह कर संजय अपने कामकाज की छाप छोड़ चुके हैं। वर्ष 2000 में आवास बंधु के कार्यकारी निदेशक के तौर पर संजय ने पहली बार नगरीय क्षेत्रों में आधारभूत विकास के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार किया था। यूपीएसआरटीसी के एमडी के तौर पर संजय भूसरेड्डी ने लखनऊ के चारबाग से ‘इंटर स्टेट बस टर्मिनल’ को हटाकर आलमबाग स्थानांतरित करने में मुख्य भूमिका निभाई थी।


    केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों में ज्वाइंट सेक्रेटरी के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके संजय ‘मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स’ के अंतर्गत आने वाले एमएमटीसी लिमिटेड में ‘चीफ विजिलेंस ऑफीसर’ के रूप में भी तैनात रहे हैं। जून, 2017 को प्रमुख सचिव चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास और आयुक्त गन्ना एवं चीनी के पद पर तैनात हुए। जून, 2019 को इन्हें प्रमुख सचिव, आबकारी की भी जिम्मेदारी मिली।


लॉकडाउन के समय संजय भूसरेड्डी ने जिस तरह यूपी में बड़े पैमाने पर सेनेटाइजर के उत्पादन में सफलता हासिल की है उसके इनके विभाग वाले भी कायल हो गए हैं। इनके  विभाग में सक्रिय रूप से काम करने वाले अधिकारी भी इन्हें अभिभावक की  उपाधि देते हैं और कहते हैं कि “इन्हें संजय भूसरेड्डी नहीं बल्कि ‘सेनेटाइजर’ भूसरेड्डी कहिए।” जाहिर है संजय भले ही चीनी विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हों लेकिन लॉकडाउन में इन्हें पहचान सेनेटाइजर ने ही दिलाई है।