अभी ज़मीर पूरी तरह मरा नहीं है ......


                  आंख के आंसू सूख गए, पेट में हलचल नहीं बची।
                            पांव में छाले शोर मचाएं, ऐसी दिखती सभी गली।



                 ओझल दुनिया से उम्मीदें, रात हुई है सुबह सवेरे।
                        मौत की गठरी बांध पीठ पर, पर चला मुसाफिर धीरे धीरे।


       कांधे पर हैं मुन्ना मुन्नी, स्वाभिमान झकझोर दे।
                       संग खड़ी थी अपनी प्यारी, कैसे बंधन तोड़ दें।


        निष्ठुर जग है, मौत है दाता, चले राह पर तीरे तीरे।
                     मौत की गठरी बांध पीठ पर, चला मुसाफिर धीरे धीरे।


                भरी धूप में खड़ी दुपहरी, खाक कहां वो छान रहा है।
                                भूखे प्यासे सड़क किनारे, गिर कर सपने फांक रहा है।


                                          बिलख रहे हैं श्रमिक देवता जाने किसने गढ़ी लकीरें।
                                                         मौत की गठरी बांध पीठ पर, चला मुसाफिर धीरे धीरे।



 






   प्रिय साथियों,

 

      कोरोना वायरस की महामारी के इस भयावह दौर में अपने गाँव की ओर मासूम बच्चों को कंधे पर उठाए हुए पिता, माँ-बाप को साईकिल पर बिठाए हुए बेटा, सूटकेस पर बच्चे को लिटाए घसीटकर चलती हुई बेबस माँ, सायकिल रिक्शा खींचते छोटे बच्चों, बैलगाड़ी में एक बैल की जगह खुद ही जुतकर परिवार को खींचने वाले लोगों को देखकर मन बहुत द्रवित है। तमाम लोग पैदल, सगड़ी, ऑटोरिक्शा, ट्रकों और अन्य साधनों से हाइवे, छोटी सड़कों एवं पुलिस के डर से पगडंडियों को पकड़कर अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं। उनमे लगभग सभी भूखे-प्यासे, हताश-निराश और मज़बूर लोग हैं। जो अपने परिवार का पेट पालने के लिए दिल्ली-मुम्बई सहित अन्य शहरों में मज़दूरी करने गए थे।अपना पसीना बहाकर दूसरों का पेट भरने की क्षमता वाले श्रमिकों को आज आपके मदद की दरकार है।

 

अतः आप सभी से अपील है कि राह चलते भूखे-मज़बूर लोगों को अपने गांव के बगीचे, विद्यालय या किसी अन्य सार्वजनिक स्थान पर रोकें, उन्हें अतिथि की भांति सम्मान देते हुए भोजन-पानी दें। यदि साधन विहीन हैं तो अपने साधन से कम से कम जिले के बॉर्डर तक छोड़ने की कोशिश करें। अगले जनपद के लोगों से अपील करें कि उन्हें आगे का भोजन-पानी उपलब्ध करवाते हुए साधन उपलब्ध करवाने का कष्ट करें।


       हम भारतवासी हैं, हमारी संस्कृति और परम्परा परोपकार की रही है। कहा जाता है कि गरीबों में ईश्वर का वास होता है, इसीलिए दरिद्रनारायण की चर्चा की गई है। हिन्दू धर्म मे अन्न दान को महादान बताया गया है, इस्लाम में गरीबों की मदद हेतु ज़कात की व्यवस्था है, सिख धर्म मे लंगर खिलाना पुण्यकर्म माना गया है और ईसाई धर्म गरीबों की सेवा और इलाज को सर्वोच्च स्थान मिला है। ऐसे में हमारा मानवीय कर्तव्य है कि हम इन हालात में अधिक से अधिक लोगों की मदद करें।
मेरी आप सभी से भावपूर्ण अपील है कि सरकारी निर्देशों एवं लॉकडाउन के नियमों का पालन करते हुए, शारीरिक दूरी बनाकर राहगीरों के लिए केवट बन जाइये जैसे वन गमन के समय प्रभु राम को केवट ने नदी पार करवाया लेकिन उतराई नही लिया, वैसे ही आप गरीब नारायण को अपने साधन से बिना किराया लिए पहुंचाइये। आप शबरी बन जाइये.... जैसे वन-वन भटकते प्रभु राम को शबरी ने मीठे बेर खिलाये और बदले में कुछ नही लिया, उसी तरह आप भी गरीब नारायण को भोजन खिलाइए। इस विपत्ति के समय विकल हो रहे बच्चों और महिलाओं का का विशेष ध्यान देने की कृपा करें। मेरा मानना है कि गरीब लाचार और ज़रूरतमंद की सेवा चारधाम की यात्रा और हज़ से कम नही है।


                                                                                                रामगोविन्द चौधरी
                                                                               (नेता प्रतिपक्ष, विधानसभा उoप्रo)