बिना सिवइयों की पहली ईद !


 


- श्याम  कुमार 


    कोरोना के प्रकोप से इस वर्श आनंद के चरमोत्कर्श वाला होलीमहापर्व सूना व्यतीत हुआ तो अब उसी प्रकोप ने ईद महापर्व के आनंद को भी निगल लिया। पहली बार बिना सिवइयों की ईद बीती। मेरे गृहनगर प्रयागराज की मीठी ईद में अनौपचारिकता की भी मिठास घुली रहती थी। लगभग एक दर्जन ऐसे निकटस्थ लोग थे, जिनके यहां ईद पर मिलने जाना जरूरी होता था। उनमें सबसे सुखद जमावड़ा नया कटरा में श्रीमती नसीर के यहां हुआ करता था। नसीर इलाहाबाद विष्वविद्यालय में प्रोफेसर थीं तथा हेमवतीनंदन बहुगुणा की पत्नी कमला बहुगुणा की घनिश्ठ मित्र थीं। मेरी भी उनसे घनिश्ठता थी और ‘रंगभारती’ के सदस्य के रूप में उनकी सक्रियता विद्यमान रहती थी। वह विदुशी व प्रगतिशील  विचारों की तथा खुषमिजाज स्वभाव की महिला थीं। ईद पर उनके यहां सिवइयों के अतिरिक्त अन्य जो व्यंजन होते थे, उनमें गरम-ंउचयगरम समोसों का जायका अभी भी याद है।



   दारा  शाह  अजमल के निवासी  शहिद फाखरी के यहां भी मैं अनिवार्य रूप से जाता था। वह वरिश्ठ कांग्रेसी नेता थे तथा पूरे रमजानभर वह अपने आवास की मसजिद में अपने को सीमित कर साधना में लीन रहते थे। उनके पुत्र जाहिद फाखरी जिला
सूचना अधिकारी थे और सज्जनता की प्रतिमूर्ति थे। जाहिद फाखरी की एक पुत्री ने संस्कृत में उच्च षिक्षा ग्रहण की। मैं उस समय सुविख्यात दैनिक ‘भारत’ में मुख्य संवाददाता एवं स्थानीय समाचार सम्पादक था, इस नाते जाहिद फाखरी प्रायः नित्य मेरे पास आते थे। महान नेता महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ईद मिलने सिर्फ षाहिद फाखरी के यहां जाते थे। मालवीय जी स्वच्छता एवं नियमों के बड़े पाबंद थे। वह गंगाजल का ही सेवन करते थे तथा जब विदेष जाते थे तो उनके साथ पर्याप्त गंगाजल ले जाया जाता था। षाहिद फाखरी के यहां ईद पर मालवीय जी के लिए विषेश व्यवस्था की जाती थी। उस दिन उनके यहां पूरी षुद्धता से केवल षाकाहारी व्यंजन बनते थे। मैं कई दषकों तक गरमी में दो महीने नैनीताल में रहा करता था और पांचसितारा राजकीय आवास नैनीताल क्लब में रुकता था। जब गरमी के उन दो महीनों में ईद पड़ती थी तो इलाहाबाद में मेरा ईद उचयमिलन नहीं हो पाता था।


   नैनीताल में भी मेरा बहुत व्यापक जनसम्पर्क था तथा जब पहली बार ईद पर मैं वहां मुसलिम बंधुओं के यहां गया तो मोटी-ंउचयमोटी सिवइयां खाने को मिलीं। पता लगा कि वहां इन्हीं सिवइयों का प्रचलन है, जबकि मैं इलाहाबाद की बनारसी रेषमी सिवइयों का अभ्यस्त था। अतः अगले वर्श मैं अपने साथ -सजयेर सारी बनारसी सिवइयां नैनीताल लेता गया और ईद से पहले अपने मुसलिम बंधुओं को वे सिवइयां दे दीं। सभी बड़े प्रसन्न हुए। नैनीताल क्लब में मेरा कक्ष- उचयसंख्या 71 सड़क के निकट स्थित था तथा कक्ष के बाहर एक बड़ा प्रांगण था। वहां मैंने क्यारियां बनवाकर खूब फूलदार पौधे व बेलें लगवा दी थीं, जिससे कक्ष व प्रांगण बड़ा सुंदर प्रतीत होता था। ईद पर मैं प्रांगण में सड़क की ओर लाउडस्पीकर लगवाकर ईदमिलन का जष्नभरा माहौल बना देता था। षुरू से मेरी रचनात्मक प्रवृत्ति रही है, इसलिए नैनीताल में दो महीने के प्रवास में मैंने प्रतिवर्श लोकनिर्माण विभाग, नगरपालिका परिशद व अन्य विभागों को प्रेरित कर न केवल नैनीताल क्लब परिसर में, बल्कि सम्पूर्ण नैनीताल में अनगिनत जनोपयोगी कार्य कराए। अनेक जगहों पर मूत्रालयों व षौचालयों के निर्माण कराए। मेरे कक्ष के बगल में ऐतिहासिक षैले हॉल था, जिसका नामकरण मैंने ‘नेताजी सुभाश प्रेक्षागृह’ किया तथा उसमें अनेक महत्वपूर्ण आवष्यक सुधार कराए। मेरे कक्ष-ंउचयसंख्या 71 से लगा हुआ बरामदा था, जहां फालतू लोग अड्डेबाजी करते थे। अतः उस बरामदे में आकर्शक खिड़कियां लगवाकर मैंने उसे कक्ष-ंउचयसंख्या 71 जुड़वा दिया था।


   जब मैं इलाहाबाद से लखनऊ पूरी तरह षिफ्ट हुआ तो यहां ईद पर मिलने जाने वाली सूची बहुत लम्बी हो गई। वैसे, पहले भी मैं प्रतिमास आठ-ंउचयदस दिन लखनऊ रहा करता था। मेरे अनुज कैलाष वर्मा जी लखनऊ में राज्य मुख्यालय से मान्यताप्राप्त पत्रकार थे। उस समय भी कभी-ंउचयकभी जब ईद पर लखनऊ रुकना पड़ जाता था तो मैं रात में इलाहाबाद प्रस्थान कर अगले दिन वहां लोगों से ईद मिलता था। लखनऊ में पत्रकार, मंत्री, अन्य नेतागण, अधिकारी वर्ग आदि इन सबकी सूची काफी बड़ी हो जाती है। मैं लगभग तीन दर्जन आवष्यक लोगों की सूची लेकर पूर्वान्ह 11 बजे के लगभग निकलता हूं और रात में लगभग इतने बजे ही लौटना हो पाता है। फिर भी उस सूची में अनेक लोग छूट जाया करते हैं, जिनकी उलाहना बाद में सुननी पड़ती है। लखनऊ में ईद पर दिनभर लोगों से मिलने में तमाम तरह के अनुभव होते हैं। राजनीतिक विचारों की गहमागहमी पता लगती है। प्रायः यह बोध होता है कि मुसलिम तबके में राश्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं नरेंद्र मोदी के बारे में गलतफहमी इतनी गहरी प्रविश्ट है कि भाजपा सरकार मुसलमानों के हित के लिए चाहे जो कर डाले, भाजपा को मुसलमानों का वोट नाममात्र का ही मिलेगा। एक जगह तो मु-हजये बड़ा आष्चर्य हुआ, जब एक मुसलिम भाजपाई को मैंने राहुल गांधी की भूरि-ंउचयभूरि प्रषंसा करते सुना। निष्चित रूप से जिस दिन उत्तर प्रदेष में भाजपा की पकड़ -सजयीली होगी, भाजपा का दामन छोड़ने वालों में वह सज्जन भी षामिल होंगे। हमारे देष में मुसलिम समाज में उदारपंथियों के बजाय कट्टरपंथी हावी रहते हैं और प्रायः वैसी ही स्थिति लखनऊ में भी है। चूंकि उदार भावना वाले मुसलिम आगे नहीं आते, इसलिए कट्टरपंथियों को मुसलिम समाज पर हावी होने का अवसर मिल जाता है।


    एक बार वरिश्ठ आईएएस अधिकारी(अब सेवानिवृत्त) माजिद अली की शयद तमिलनाडु में चुनाव-उचयड्यूटी लग गई थी, किन्तु ईद पर उनके यहां जाने पर उनकी अनुपस्थिति में उनकी पत्नी एवं बच्चे ने जिस तरह खातिरदारी की थी, वह हमेषा याद रहेगी। गोमतीनगर की एल्डिको कॉलोनी में दूरदर्षन के वरिश्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी रियाज खान एवं उनकी पत्नी फिरोजा खान के यहां गए बिना तो मेरी ईद पूरी ही नहीं होती। अहमद हसन समाजवादी पार्टी के वरिश्ठ नेता हैंतथा उनके यहां षाही तौरतरीके से ईद की व्यवस्था रहती है। अहमद हसन से मेरी पांच दषक पुरानी मित्रता है। जब मैं इलाहाबाद में वरिश्ठ पत्रकार था, अहमद हसन वहां पुलिस उपाधीक्षक-ंउचयद्वितीय पद पर तैनात थे। जगमोहन सक्सेना पुलिस उपाधीक्षक-ंउचयप्रथम थे। वरिश्ठ आईएएस अधिकारी(अब सेवानिवृत्त) सैयद अली ताहिर रिजवी के यहां कई पुराने सेवानिवृत्त वरिश्ठ आईएएस अधिकारियों से भेंट हो जाती है। जब वह उत्तर प्रदेष षासन में वरिश्ठ प्रमुख सचिव थे और गौमतपल्ली में रहते थे तो ईद पर उनका कहा यह वाक्य कभी नहीं भूलता है-ंउचय‘ईद तो अब एक तरह से हिंदुओं का त्योहार हो गया है, क्योंकि ईद के दिन मिलने आने वाले सभी हिंदू होते हैं तथा मुसलिम एक-ंउचयदूसरे के यहां अगले दिन जा पातेहैं।’ षब्बीर अहमद भारत संचार निगम के मुख्य महाप्रबंधक पद से रिटायर हुए तथा उनके यहां ईद पर विभाग के अनेक सेवानिवृत्त एवं वर्तमान वरिश्ठ अधिकारियों से भेंट हो जाती है। षब्बीर अहमद की योग्यता व ईमानदारी बेजोड़ है तथा निष्चित रूप से मोदी सरकार को उनकी योग्यता का लाभ उठाना चाहिए था। तमाम जगह ईद पर मेरी प्रतीक्षा होती है, किन्तु अफसोस इस बार की ईद पहली बार सूनी बीती।