लॉकडाउन के दौरान काम आएगा धीरज:मधुकर त्रिवेदी

 



                
       कोरोना वायरस के प्रकोप से दुनिया दहल गई है। विश्व की सुपर पावर अमेरिका से लेकर  एशिया  के बड़े ड्रैगन चीन तक में इस महामारी का आतंक है। दुनिया के कई देशों फ्रांस, इटली, स्पेन, जर्मनी, ब्रिटेन, ईरान, टर्की, बेल्जियम, दक्षिण कोरिया जैसे देशों में रोज हो रही हजारों मौतों से हाहाकार मचा हुआ है। अभी तक इस महामारी की कोई प्रभावी दवा भी नहीं बन सकी है।


     भारत में भी इस भयंकर वायरस ने अपने पैर पसार लिए हैं। उत्तर प्रदेशों सहित कई अन्य प्रांतों में तमाम लोग कोरोना संक्रमित पाए गए हैं। कई मामलों में  विदेशो से आए संक्रमित लोगों की लापरवाही ने यहां के हालात खराब किए। अंधविष्वास और अज्ञानता के फलस्वरूप भी तमाम लोग इस बीमारी की भयंकरता को नहीं समझ पाए। यह अच्छा हुआ कि सरकार ने लॉकडाउन जैसे कदम तत्परता से उठाए जिससे स्थिति बिगड़ने से नियंत्रित रही। 


     


        हम सबने लम्बे समय तक लॉकडाउन में घरों में कैद होने का पहली बार अनुभव किया सोशल डिस्टैंसिंग लागू होने से आसपड़ोस में भी मिलना-जुलना बंद हो गया। बच्चों के स्कूल बंद, दफ्तर बंद, बाजार बंद, सड़क पर चलना बंद, सिनेमा और माल बंद नतीजा आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों पर भी रोक लग गई। इस सबके बावजूद देश  भर में ज्यादातर लोगों ने इन सरकारी प्रतिबंधों और निर्देशों का पालन किया है। 


     यह भारत की विषेशता है कि संकट के समय सभी देशवासी अपने मतभेद भुलाकर एक साथ मुकाबले को तैयार हो जाते हैं। कोरोना संकट के समय भी सवा अरब देश वासियों ने जो एकता दिखाई उसका ही परिणाम है कि भारत में कोरोना संकट का प्रसार कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रहा है। भारत दुनिया के कुछ बड़े देशो  की तरह स्वास्थ्य सुविधाओं में समृद्ध नहीं है फिर भी यहां के डाक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्य सेवा कर्मियों के साथ पुलिस ने संक्रमण के खिलाफ लड़ाई में पूरा योगदान दिया है जिसकी जितनी सराहना की जाए कम है। कुछ जगहों पर उनके काम में बाधाएं डाली गई फिर भी वे कर्तव्य पालन में पीछे नहीं हटे। 


                   


     देशभर में जो लॉकडाउन 24 मार्च 2020 की आधी रात से लागू हुआ उससे कुछ समस्याएं भी पैदा हुईं। विशाल जनसंख्या वाले देश  में यह स्वाभाविक है। विभिन्न प्रांतों में काम कर रहे लोग अपने घरों को लौटने के लिए व्याकुल हो उठे। रेल, बस, जहाज की सेवाएं बंद थी, तो लोग पैदल या जो साधन मिला उससे समूह में निकल पड़े। उनको सम्हालने, भूखे प्यासे लोगों को भोजन-पानी देने में प्रशासन के हाथपांव फूल गए। फिर भी कहीं उपद्रव नहीं हुआ। देशी- विदेशी लोगों की इस भीड़ में संक्रमण का परीक्षण भी सम्भव नहीं रहा। इससे कोरोना ने अपना असर दिखाना शुरू किया। सरकार ने इसके साथ गरीबों को राहत पहुंचाने की व्यवस्था की जिसमें स्वयंसेवी संगठन भी पीछे नहीं रहे। राशनकार्ड धारक हों या उसके बगैर उनको भी राशन दुकानों से राशन दिया जा रहा है। श्रमिकों को आर्थिक मदद भी दी जा रही है। 


      कोरोना संकट में लॉकडाउन से सबसे ज्यादा प्रभावित महिलाएं ही हुई हैं। वैसे भी हर आपदा की पहली शिकार दुनिया में महिलाएं ही होती हैं। लॉकडाउन होते ही घर के आटा-दाल, सब्जी, दूध की समस्या उनके सिर पर आ पड़ी। घर की गृृहस्थी की गाड़ी तो महिलाएं ही चलाती हैं। हर तरफ बंदी के असर में घर में महिलाओं की व्यस्तता कई गुना बढ़ गई है। पति और बच्चों की खाने-पीने की फरमाइशो पर चौके में वही खट रही है। बच्चे बाहर जा नहीं सकते, दोस्तों के संग खेल नहीं सकते तो उनके गुस्से से निबटना पड़ता है। पतिदेव की चिड़चिड़ाहट बाहर दोस्ती, घूमने फिरने पर रोक की वजह से अपनी जगह होती है। बुजुर्गो और सास ससुर से रिश्ते  भी तनाव में हो जाते हैं। फलतः लॉकडाउन में घरेलू हिंसा के मामले भी बढ़े हैं। इसमें अवसाद भी बढ़ता है। लेकिन यदि परस्पर समझदारी से चलें तो रिश्ते सुखद भी बन सकते हैं।


      अब जब कोरोना से बचना है और परिवार को भी सुरक्षित रखना है तब अकेली महिला पर पड़ने वाला सारा बोझ तनाव पैदा करेगा ही। महिलाओं को भी इससे बचने के लिए योग, ध्यान और व्यायाम के लिए समय देना चाहिए। बच्चों को पेंटिंग, डांस या किसी इन्डोर खेल में व्यस्त रखें।


    यदि किसी के पास साधन है तो पड़ोस में किसी की मदद में खड़े होने में संकोच नहीं करना चाहिए। स्वास्थ्य कर्मियों-पुलिस कर्मियों की भी यथा संभव मदद करें। जरूरतमंद गरीबों के लिए आपसी दूरी बनाते हुए भोजन बनाने अथवा उनको राहत सामग्री बांटने का काम महिलाएं आसानी से कर सकती हैं। मास्क, सैनिटरी पैड या सैनिटाइजर बनाने का काम घर से किया जा सकता है।


    घरेलू और बाहरी दोनों मोर्चो पर आज के इस संकट काल में महिलाएं साहस और धैर्य के साथ डटी हुई हैं। उनको भी इस समय समर्थन और सहयोग चाहिए ताकि उनका मनोबल कम न हो। घर में महिला के साथ कामकाज में पुरूषो व बच्चों को भी मदद देनी चाहिए। पुरूषो के लिए भी अवकाश  के ये क्षण यादगार बन सकते हैं। अपनी सुबह- शाम घर में, छत पर टहलें और हल्का फुल्का व्यायाम करें। योग करें। कोई अभिरूचि हो पेंटिंग, संगीत, लेखन में तो उसको अपनाएं। रसोई में पत्नी का हाथ बंटाने के लिए सब्जी धोने, काटने का काम कर सकते हैं और अगर पाक कला आती हो तो किसी दिन मन पसंद एक दो डिश भी बनाकर घरवालों को खिला दें। 


               


     यह जरूरी नहीं कि पत्नी ही रोज आपको सुबह-शाम की चाय और नाष्ता बनाकर दें। आप भी एक वक्त की जिम्मेदारी तो ले ही सकते हैं। देखिए इसके बाद घर का माहौल कितना खुशनुमा हो जाएगा। टीवी में नए पुराने सीरियल देख कर समय काट सकते हैं। मोबाइल कम देखिए तो बेहतर।कहीं बाहर आना जाना नहीं है तो बच्चों को समय दें उनके साथ खेल में शमिल हों और उन्हें पढ़ाने का काम भी हाथ में लें। महिलाएं भी, उनकी जो हाबी छूट गई हो, उसे इन दिनों अपना सकती हैं। घर में सभी को ख्याल रखना चाहिए कि वे एक दूसरे को थोड़ा स्पेस देने में संकोच न करें। आखिर घर की मालकिन को भी तो फुरसत के दो क्षण चाहिए। परस्पर सहयोग और साथ से घर में शंति रहेगी और घर का जो सदस्य बाहर कार्यरत हैं, उनको भी अपने कर्तब्य पालन के क्षणों में कोई चिंता नहीं होगी। कोरोना से लड़ाई में मोर्चे पर डटी वीर महिलाओं ने अपना शादी-निकाह टाल दिया, गर्भवती होने पर भी सेवा कार्य में जुटी हैं। नवजात  शिशु को गोद में लेकर अपनी डयूटी तथा प्रशासनिक कार्य निबटा रही हैं।देश -प्रदेश का इस नारी शक्ति को नमस्कार !


                                     (लेखकः यश भारती सम्मान, प्रभाश जोशी  पुरस्कार प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार हैं)