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- बलजीत सिंह बेनाम


          ग़ज़ल


खुशियों का मेला या मातमपुर्सी का,
प्यार से बढ़कर मोल है सोने चाँदी का.


मुफ़लिस कर भी क्या सकता है बेचारा,
धोंस दिखाता है जब गुंडा वर्दी का.


उसको दुनिया के झगड़ों से क्या मतलब,
लीड़र का तो किस्सा केवल कुर्सी का.


सच्चों की ज़ुबाँ पर होंगे फिर से ताले,
चर्चा होगा  बस झूठों की गवाही का.