श्रमदाता से संविधानदाता तक

                       


भारत माता के सौंदर्य को स्वरूप देने वाले आज तक दो ही शिल्पी नज़र आते हैं एक श्रम-दाता और दूसरा संविधान-दाता। देश बुनियादी रूप से इन्हीं दो लोगों के कंधे पर है। आज दोनों की महत्ता इस क़दर मौजू हो उठी है कि जिसका कोई जवाब नहीं। इन दोनों दाताओं में एक बहुत महत्वपूर्ण दाता है जिसे हम अन्न-दाता कहते हैं। अन्नदाता मूलतः श्रमदाता ही है।


वर्तमान सामाजिक व राजनीतिक परिदृश्य को देखने से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि जितनी आवश्यकता किसानी की है उतनी ही संविधान की, जितनी अनाज की है उतनी ही न्याय की। आज दोनों- अन्नदाता और संविधानदाता के राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया में योगदान के ठीक से समझने और उसके मूल्यांकन का समय है। आज जैसे अन्नदाता के श्रम_सृजन का कोई मूल्य नहीं दिया जा रहा है वैसे ही संविधान दाता के न्याय_सृजन का भी बहिष्कार कर दिया जा रहा है। इन दोनों दाताओं के आज के भारत में भरसक झुठलाया जा रहा है। दोनों की 'उपज' का मुल्य और महत्व कुछ लोग अपने हिसाब से तय कर रहे हैं और सरेबाजार उसकी बोली लगवाकर नीलाम कर रहे हैं। जो ऐसा कर रहे हैं वे इस क़दर अंधराये हुए हैं कि उन्हें पता ही नहीं है कि वे अपनी ही भारतमाता की बोली लगाकर उसकी इज़्ज़त नीलाम कर रहे हैं।



 



बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर उस श्रमजीवी संस्कृति से आते हैं जिससे आज हर मेहनतकश जूझ रहा है। बाबा साहेब के जीवन ने जाति का दंश तो झेला ही है श्रम का अपमान भी सहा है। उनका जीवन कर्म के तिरस्कार, मनुष्य के बहिष्कार से निकलर परम्परा के अस्वीकार से होता हुआ चेतना के परिष्कार तक पहुंचता है। #उनका_पूरा_जीवन_ही_मानवीय_चेतना_का_संविधान_है


बाब साहब बहुत सी बातों को लेकर खासे अडिग थे। वे जिन मुद्दों पर अपनी वैचारिक स्तिथि निश्चित कर लेते थे फिर उसमें किसी सुधार की कोई गुंजाइश नहीं रखते थे। ऐसा निश्चयीकरण कहीं न कहीं मनुष्य की प्रवाहमान चिंतन प्रक्रिया में बाधा भी उत्पन्न करता है। लेकिन वे किसी प्रकार की त्रुटि के स्वीकार का अवकाश भी अवश्य रखते थे।


आज वतर्मान स्थिति को देखकर अब ऐसा लगता है कि सब ने 'अंतिम वाक्य' की दीक्षा प्राप्त कर ली है, अब किसी को कुछ भी सुनने-समझने की आवश्यकता नहीं बची है, सब सशरीर मोक्षगामी हो चले हैं तो ऐसे वक़्त में बाबा साहेब आंबेडकर की चिंतन यात्रा से गुजरना हम सबका एक मानवीय व नागरिक कर्तव्य बन जाता है। श्रमदाता व संविधानदाता के श्रमवाद एवं संविधानवाद की स्थापत्य और प्रसार ही बाबा साहेब को याद रखने का सबसे सच्चा तरीका है।