• भूपेन्द्र यादव को केन्द्रीय मंत्री बनवाने में राजस्थान भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया की सहमति भी काम आई।
  • भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे को सर्बानंद सोनोवाल और ज्योतिरादित्य से सीख लेनी चाहिए।

मोदी सरकार में शामिल होने वाले कई नए चेहरों में एक भूपेंद्र यादव भी हैं। 30 जून, 1969 को जन्मे भूपेंद्र यादव ने अजमेर के सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल की। सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर चुके भूपेंद्र यादव अजमेर के ही कुंदन नगर के रहने वाले हैं। भूपेंद्र यादव ने बीजेपी में रहते हुए कई अहम पद संभाले। वो साल 2000 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के महासचिव बने। इसके अलावा साल 2010 में वो भाजपा के राष्ट्रीय सचिव भी नियुक्त हुए थे। भूपेन्द्र यादव गवर्नमेंट कॉलेज अजमेर के छात्रसंघ अध्यक्ष और 1992 में गुरुग्राम में भाजयुमो के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

अजमेर निवासी और राजस्थान से राज्यसभा के सांसद भूपेंद्र यादव ने 8 जुलाई को मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री की शपथ ली और रात को यादव को देश का पर्यावरण वन जलवायु परिवर्तन, श्रम और रोजगार मंत्रालयों का जिम्मा दे दिया। यादव को भारत जैसे विशाल देश के इतने विभागों की जिम्मेदारी मिलना अपने आप में महत्व रखता है। यादव अभी तक भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। महासचिव के पद पर रहते हुए यादव ने संगठन में जो भूमिका निभाई उसी का परिणाम हैं कि उन्हें सरकार में शामिल होने का अवसर मिला है।

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यह सही है कि यादव का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से सीधा संवाद था, लेकिन यादव को केन्द्रीय मंत्री बनवाने में राजस्थान भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया की सहमति भी काम आई है। पूनिया एक जुलाई से तीन जुलाई तक दिल्ली में ही थे। पूनिया ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, संगठन महासचिव बीएल संतोष, प्रदेश के प्रभारी महासचिव अरुण सिंह और सबसे अंत में भूपेंद्र यादव से मुलाकात की। तब खबरों में कहा गया कि पूनिया की यह शिष्टाचार मुलाकात थी, लेकिन जानकार सूत्रों के अनुसार भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं ने मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार को लेकर राजस्थान के संदर्भ में पूनिया से बात की। पूनिया से हुए संवाद का ही नतीजा है कि हटाए गए 12 मंत्रियों में से राजस्थान का एक भी नहीं है। भले ही अर्जुनराम मेघवाल की पदोन्नति नहीं हुई हो, लेकिन मेघवाल के महत्व को बनाए रखा गया है।

May be an image of 5 people, people sitting and text that says 'गत 3 जुलाई को दिल्ली में भूपेन्द्र यादव और सतीश पूनिया की मुलाकात का फोटो'

भूपेन्द्र यादव के नाम पर भी पूनिया की सहमति रही। असल में यादव के कैबिनेट मंत्री बनने से राजस्थान में पूनिया को ही मजबूती मिलेगी। 2013 के विधानसभा चुनाव में यादव ही प्रभारी थे और तब भाजपा को 200 में से 160 सीटें मिली थी। राजस्थान के एक एक विधान सभा क्षेत्र की जानकारी यदाव को है। संगठन में काम करने वाले व्यक्ति को जब मंत्री बनाया जाता है तो राजनीति में उसका कद और बढ़ जाता है।

इसलिए राष्ट्रीय महासचिव के बाद कैबिनेट मंत्री बनाया जाना यादव के लिए महत्वपूर्ण है। इसे राजस्थान में भविष्य की राजनीति के तौर पर भी देखा जा सकता है। अभी तो यादव की उम्र 52 वर्ष हुई है। यादव के सरकार में शामिल होने से अब राजस्थान के चार मंत्री हो गए है। मेघवाल और कैलाश चौधरी राज्य मंत्री है तो यादव और गजेन्द्र सिंह शेखावत कैबिनेट मंत्री। कोटा के सांसद ओम बिरला पहले ही लोकसभा के अध्यक्ष है। ऐसी स्थिति में केंद्र में राजस्थान का खास दबदबा हो गया है।


वसुंधरा राजे सीख लें :-

यूं तो राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा समय में भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे एक अनुभवी राजनेता है, लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद भी राजे राजस्थान में ही राजनीति करने की जिद कर रही हैं। इससे प्रदेश में भाजपा को नुकसान भी हो रहा है। राजे को भी कोई राजनीतिक फायदा नहीं हो रहा। ऐसी स्थिति में राजे को मध्यप्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया, असम के पूर्व सीएम सर्बानंद सोनोवाल जैसे नेताओं से सीख लेनी चाहिए।

असम में लगातार दूसरी बार भाजपा की सरकार बनी, लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व के इशारे पर सोनोवाल ने मुख्यमंत्री का अपना दावा छोड़ दिया। इसी प्रकार मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरा कर भाजपा की सरकार स्थापित करने वाले सिंधिया ने मध्यप्रदेश में ही राजनीति करने की जिद नहीं की।

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अब सिंधिया का प्रदेश में भाजपा की सरकार में भी दखल हैं तो स्वयं मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बन गए हैं। वसुंधरा राजे तो दो बार प्रदेश की मुख्यमंत्री भी रह चुकी है। अभी यह तो नहीं कहा जा सकता कि राजे के नकारात्मक रवैये से भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व नाराज है, लेकिन सब जानते हैं कि जब राजे मुख्यमंत्री थी तब कोई मंत्री, विधायक, भाजपा का पदाधिकारी या कोई प्रशासनिक अधिकारी जिद जैसी बात करता था तो राजे का गुस्सा सातवें आसमान पर होता था। राजे खुद देखें कि उन्होंने किस शाही अंदाज में राज किया।

मुख्यमंत्री रहते हुए जब राजे यह चाहती थीं कि सब लोग उनकी बात माने तो फिर अब राजे भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व की सलाह को क्यों नहीं मान रही हैं। राजे तो धार्मिक प्रवृत्ति की है और उनका भगवान पर भरोसा है। यदि ईश्वर की कृपा होगी तो राजे तीसरी बार भी राजस्थान की मुख्यमंत्री बन जाएंगी, लेकिन यदि कृपा नहीं होगी तो कितनी भी जिद कर लें, कुछ हासिल नहीं होने वाला हे। राजे को जो सम्मान भाजपा में मिलेगा वो स्वयं का दल बनाने या फिर कांग्रेस की मदद करने से कभी नहीं मिलेगा। राजे को नए लोगों का आगे लाने का अवसर देना चाहिए।